• 29 Mar, 2026

पंचविंश अध्याय – विष्णुवर्द्धन | श्रीरामानुजाचार्य जीवन कथा

पंचविंश अध्याय – विष्णुवर्द्धन | श्रीरामानुजाचार्य जीवन कथा

श्रीरामानुजाचार्य का चोल राज्य की सीमा पार कर बौद्ध राजा विठ्ठलदेव को वैष्णव धर्म में दीक्षित करना, व्याधों और भक्तों के मार्गदर्शन से यात्रा और भक्तग्राम की घटनाएं।

पंचविंश अध्याय – विष्णुवर्द्धन

गहन वन में छिपकर यात्रा

श्रीरामानुज स्वामी अपने भक्तों के साथ श्रीरंग के पश्चिम ओर के गहन वन में छिप गए। गोविन्द, दाशरथि, धनुर्दास आदि उनके साथ चले। कृमिकण्ठ के दूतों द्वारा पता लग जाने का भय था, इसलिए उन्होंने लगातार दो दिन तक बिना निद्रा, आहार या विश्राम के चलते हुए चोलराज्य की सीमा तक यात्रा की। अत्यधिक थकावट के कारण उन्होंने एक पर्वत के समीप विश्राम किया, जहां शरीर की विवर्णता और कांटों के कारण उनके हाथ-पैर शिथिल हो गए थे।

व्याधों का आश्रय और आशीर्वाद

नजदीक के व्याधों ने भक्तों को थकित देखकर उनका आदर किया और फल तथा लकड़ी का इंतज़ाम किया। भक्तों ने निर्मल जल में स्नान करके फलों का नैवेद्य भगवान को अर्पित किया और दो दिन बाद फलाहार करके आनंदित हुए। यतिराज ने व्याधों को आशीर्वाद दिया और ब्राह्मण बस्ती ढूँढने के लिए आगे बढ़े। कुछ व्याध मार्गदर्शन के लिए उनके साथ चले।

रंगदास और चेलाचलाम्बा के घर पर आगमन

यात्रा के दौरान वे एक ब्राह्मण रंगदास के घर पहुँचे। घर में उसका पति नहीं था, किंतु पतिव्रता वैष्णवी चेलाचलाम्बा ने उनका स्वागत किया और भोजन तैयार किया। भिक्षाटन के पश्चात् तीन दिन के अनाहार के बाद यतिराज और उनके शिष्य फलाहार करके प्रसन्न हुए। दो दिन वहां रहने के पश्चात रंगदास को वैष्णव मंत्र से दीक्षित किया गया और उत्तर-पश्चिम की ओर यात्रा जारी रखी गई।

शालग्राम नगरी में आन्ध्रपूर्ण की सेवा

यात्रा के दौरान यतिराज शालग्राम नगरी पहुँचे और वहाँ तपस्वी ब्राह्मण आन्ध्रपूर्ण के अतिथि हुए। आन्ध्रपूर्ण की वैराग्य और भक्ति देखकर उसे वैष्णव मंत्र से दीक्षित किया और अपने सहचरों में शामिल किया। आन्ध्रपूर्ण ने गुरु की सेवा और उनके इष्ट-देव के रूप में सभी कार्य समर्पित भाव से करना शुरू किया।

नृसिंहक्षेत्र और राजा विठ्ठलदेव का वैष्णवीकरण

यतिराज और उनके शिष्य नृसिंहक्षेत्र गए और वहां के भक्तग्राम के एक भक्त के घर अतिथि हुए। राजा विठ्ठलदेव, जो बौद्ध थे, अपनी कन्या के रोग का निदान खोज रहे थे। यतिराज के दर्शन से राजकुमारी आरोग्य हो गई। इससे राजा आश्चर्यचकित हुआ और उन्होंने वैष्णव धर्म के उपदेश हेतु यतिराज को आमंत्रित किया। श्रीरामानुज ने सरल और मनोहर युक्तियों द्वारा बौद्ध पंडितों को समझाया। कई पंडित उपहास और अपमान करना चाहते थे, किंतु राजा की आज्ञा से उन्हें सभामंडप से बाहर किया गया।

बौद्ध पंडितों का परास्त होना और दीक्षा

सभा में यतिराज ने वैष्णव धर्म की व्याख्या की। बौद्ध पंडितों ने अपने मत का विरोध नहीं कर पाए और अंततः सबने वैष्णव धर्म स्वीकार किया। राजा ने यतिराज द्वारा दीक्षित होकर वैष्णव धर्म ग्रहण करने के बाद अपने नाम को विष्णुवर्द्धन रखा और इसके प्रचार की आज्ञा दी। इस प्रकार बौद्ध धर्म के विपरीत शक्तिशाली वैष्णव धर्म का प्रचार हुआ और अनेक लोग वैष्णव धर्म में दीक्षित हुए।

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Hari Krishna Regmi

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I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.