• 29 Mar, 2026

यममार्गकी यातनाओंका वर्णन, वैतरणी नदीका स्वरूप, यममार्गके सोलह पुरोंमें क्रमश: गमन तथा वहाँ पुत्रादिकोंद्वारा दिये गये पिण्डदानको ग्रहण करना

यममार्ग की यातनाएँ, वैतरणी नदी का स्वरूप और सोलह पुरों की यात्रा

गरुड़जी ने पूछा— हे केशव! यमलोक का मार्ग कैसा है? पापी लोग वहाँ किस प्रकार जाते हैं? कृपया बताइये।

भगवान श्रीविष्णु बोले— हे गरुड़! यममार्ग अत्यन्त दुःखद है। मेरा भक्त होने पर भी उसे सुनकर कांप उठोगे।

यममार्ग का भयानक स्वरूप

वहाँ न वृक्षों की छाया है, न अन्न, न जल। बारहों सूर्य की भांति प्रचण्ड ताप से मार्ग तपता रहता है। कहीं बर्फ़ीली हवा, कहीं काँटे, कहीं विषैले सर्प—पापी इन सब से पीड़ित होता है।

सिंह, व्याघ्र, भयंकर कुत्ते, बिच्छू और अग्नि—इन सबके द्वारा यातनाएँ मिलती हैं। आगे वह दो हजार योजन विस्तृत असिपत्रवन में पहुँचता है जहाँ दावाग्नि और तलवार-जैसे पत्ते उसे चीरते हैं।

कहीं अंधे कुएँ, कहीं विकट पर्वत, कहीं छूरों की धार, कहीं कीलें—यात्री लगातार गिरता-पड़ता, घायल होता चलता है।

कहीं जलते कीचड़, कहीं विष्ठा से भरे सरोवर, कहीं दग्ध ताम्रमय मार्ग, कहीं अंगारों की वर्षा—यममार्ग का प्रत्येक कदम दुःखपूर्ण है।


🔗 गरुडपुराण के पूर्व अध्याय


वैतरणी नदी का वर्णन

यममार्ग के बीच बहनेवाली वैतरणी नदी अत्यंत भयानक है—

  • सौ योजन चौड़ी
  • पूय (मवाद) और रक्त से प्रवाहित
  • हड्डियों के ढेर से बने तट
  • मांस और रक्त का कीचड़
  • विशाल ग्राह (घड़ियाल), मगर, शिशुमार, जोंकों और मांसभक्षी जलचर
  • वज्रचंचु गिद्ध, कौए और सूई-मुख कीड़े

पापियों को देखकर नदी कड़ाही में घृत की भाँति खौलने लगती है। उसमें गिरा हुआ पापी “हा पुत्र!”, “हा तात!” कहता हुआ विलाप करता है।

भँवरों में पड़कर वह बार-बार पाताल में गिरता है और ऊपर आता है। इस नदी को पार करना अत्यन्त कठिन है—दान, विशेषकर वैतरणी-गौदान के बिना इसका पार नहीं मिलता।

यमदूतों द्वारा पापियों की दशा

कुछ पाश से बँधे, कुछ अंकुश से खींचे, कुछ शस्त्र की नोक से चलाए जाते हैं। कुछ कान-नाक के पाश से, और कुछ कौओं से घसीटे जाते हैं।

वे लोहे के बोझ ढोते हुए, यमदूतों से पीटे जाते, रक्त वमन करते और वही रक्त पुनः पीते हुए आगे बढ़ते हैं। अपने पापों को याद करके विलाप करते हुए पश्चात्ताप करते हैं।

पापी जीव का पश्चात्ताप

“मैंने दान नहीं किया, यज्ञ नहीं किया, देवपूजा नहीं की, ब्राह्मण-सेवा नहीं की, पाप ही पाप किया—अब वही फल भोग रहा हूँ”—इस प्रकार प्राणी रोता हुआ चलता है।

नारियाँ भी विलाप करती हैं—“मैंने पातिव्रत्य नहीं निभाया, पति की सेवा नहीं की, सत्कर्म नहीं किया”—और पिछले जन्म की स्मृतियों से व्याकुल होती हैं।

यममार्ग के सोलह पुर और पिण्डदान का ग्रहण

यात्रा 17वें दिन सौम्यपुर से आरम्भ होती है और एक वर्ष तक चलती है। प्रत्येक पुर में वह अपने पुत्र-पौत्रों द्वारा दिये गये पिण्डों को पाकर आगे बढ़ता है।

सोलह पुरों की यात्रा (क्रम अनुसार)

  1. सौम्यपुर – प्रथम विश्राम, मासिक पिण्ड
  2. सौरिपुर – त्रैपाक्षिक अन्न
  3. नगेन्द्र भवन
  4. गन्धर्वनगर – त्रैमासिक पिण्ड
  5. शैलागमपुर – पत्थर वर्षा
  6. क्रौंचपुर – पंचम मासिक पिण्ड
  7. क्रूरपुर – ऊनषाण्मासिक पिण्ड
  8. चित्रभवन – विचित्र राजा का नगर
  9. बह्वापदपुर – सप्तम मासिक पिण्ड
  10. दुःखदपुर
  11. नानाक्रन्दपुर
  12. सुतप्तभवन – दशम मासिक पिण्ड
  13. रौद्रपुर – एकादश मासिक पिण्ड
  14. पयोवर्षणपुर – ऊनाब्दिक पिण्ड
  15. शीताढ्यपुर – अत्यधिक शीत
  16. बहुभीतिपुर – पुराना शरीर छोड़ना

अन्ततः वह अंगुष्ठ-मात्र प्राणदेह लेकर यमपुरी के दक्षिण द्वार पर पहुँचता है।

अध्याय का निष्कर्ष

हे गरुड़! यममार्ग का यह वर्णन मैंने तुमसे कहा। भूख, प्यास और दुःख से पीड़ित जीव अपने कर्मानुसार ही यह सब भोगता है।

॥ इस प्रकार गरुडपुराण – सारोद्धार के अंतर्गत ‘यममार्ग-निर्वचन’ नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥

Hari Krishna Regmi

Hari Krishna Regmi

I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.