• 29 Mar, 2026

यमलोक एवं यम-सभाका वर्णन, चित्रगुप्त आदिके भवनोंका परिचय,धर्मराजनगरके चार द्वार, पुण्यात्माओंका धर्मसभामें प्रवेश

गरुडपुराण – धर्मराज नगर निरूपण

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गरुडजी का प्रश्न – यमलोक का स्वरूप

गरुडजीने कहा-हे दयानिधे! यमलोक कितना बड़ा है, कैसा है, किसके द्वारा बनाया हुआ है, वहाँकी सभा कैसी है और उस सभामें धर्मराज किनके साथ बैठते हैं? ॥ १॥

हे दयानिधे! जिन धर्मोंका आचरण करनेके कारण धार्मिक पुरुष जिन धर्ममार्गोंसे धर्मराजके भवनमें जाते हैं, उन धर्मों तथा मार्गोंके विषयमें भी आप मुझे बतलाइये॥२॥

धर्मराज नगर का दिव्य वर्णन

श्रीभगवान्ने कहा-हे गरुड! धर्मराजका जो नगर नारदादि मुनियोंके लिये भी अगम्य है उसके विषयमें बतलाता हूँ, सुनो। उस दिव्य धर्मनगरको महापुण्यसे ही प्राप्त किया जा सकता है॥३॥

दक्षिण दिशा और नैर्ऋत्यकोणके मध्यमें वैवस्वत (यम)-का जो नगर है, वह सम्पूर्ण नगर वज्रका बना हुआ है, दिव्य है और असुरों तथा देवताओंसे अभेद्य है॥४॥

वह पुर चौकोर, चार द्वारोंवाला, ऊँची चहारदीवारीसे घिरा हुआ और एक हजार योजन प्रमाणवाला कहा गया है॥५॥

चित्रगुप्त का भवन एवं कर्मलेख

उस पुरमें चित्रगुप्तका सुन्दर मन्दिर है, जो पचीस योजन लम्बाई और चौड़ाईमें फैला हुआ है॥६॥

वे मनुष्योंके पाप और पुण्यका लेखा-जोखा (अभिलेख) करनेमें त्रुटि नहीं करते। जिसने जो शुभ अथवा अशुभ कर्म किया है, चित्रगुप्तकी आज्ञासे उसे उन सबका भोग करना होता है ॥ ११-१३॥

धर्मराज का महाभवन और दिव्य सभा

चित्रगुप्तके भवनसे बीस योजन आगे नगरके मध्यभागमें धर्मराजका महादिव्य भवन है। वह दिव्य रत्नमय तथा विद्युत्की ज्वालामालाओंसे युक्त और सूर्यके समान देदीप्यमान है॥१६-१७॥

उस (धर्मराजके) भवनमें सौ योजन लम्बी-चौड़ी दिव्य सभा है जो सूर्यके समान प्रकाशित, चारों ओरसे देदीप्यमान तथा इच्छानुसार स्वरूप धारण करनेवाली है॥२४॥

धर्मराज की सभा में स्थित महापुरुष

दस योजन विस्तीर्ण और सभी प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित उस सभामें अनुपम एवं उत्तम आसनपर धर्मराज विद्यमान रहते हैं ॥ ३१॥

अत्रि, वसिष्ठ, पुलह, दक्ष, क्रतु, अंगिरा, जमदग्निनन्दन परशुराम, भृगु, पुलस्त्य, अगस्त्य, नारद-ये तथा अन्य बहुत-से पितृराज (धर्मराज)-के सभासद हैं ॥३९-४० ॥

धर्मराज के नगर में जाने के मार्ग

धर्मराजके पुरमें जानेके लिये चार मार्ग हैं। पापियोंके गमनके लिये जो मार्ग है उसके विषयमें मैंने तुमसे पहले ही कह दिया॥४८-४९ ॥

पूर्व मार्ग – पुण्यात्माओं का मार्ग

सत्य और धर्ममें रहनेवाले, क्रोध और लोभसे रहित, पिता-मातामें भक्ति रखनेवाले… ये सभी सुशील और शुद्ध बुद्धिवाले धर्मराजकी सभामें जाते हैं ॥ ५६–५८॥

उत्तर मार्ग – दान, तप और तीर्थ

इस मार्गसे वैदिक, अभ्यागतोंकी पूजा करनेवाले, दुर्गा और सूर्यके भक्त… वे व्यक्ति उत्तरद्वारसे धर्मसभामें जाते हैं ॥ ६३-६४॥

पश्चिम मार्ग – ज्ञान, वैराग्य और भक्ति

इस मार्गसे आत्मतत्त्ववेत्ता, सत्-शास्त्रोंके परिचिन्तक, भगवान् विष्णुके अनन्य भक्त… वे उस भवनके पश्चिम द्वारसे प्रविष्ट होकर धर्मसभामें पहुँचते हैं ॥६९-७३ ॥

धर्मराज का उपदेश

अस्थिर शरीरसे और अस्थिर धन आदिसे कोई एक बुद्धिमान् मनुष्य ही स्थिर धर्मका संचयन करता है। इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नोंको करके धर्मका संचय करना चाहिये ॥७७-८१ ॥

पुण्यात्माओं की स्वर्गगति

ऐसा धर्मराजका वचन सुनकर वे देवताओंके द्वारा पूजित होकर विमानसमूहोंसे परम पदको जाते हैं ॥ ८२-८३॥

और वहाँ एक कल्पपर्यन्त रहकर पुण्य-दर्शनवाले मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है ॥ ८४॥

यमलोक वर्णन का फल

(हे गरुड!) तुमने यमलोकके विषयमें पूछा था, वह सब मैंने बता दिया, इसको भक्तिपूर्वक सुननेवाला व्यक्ति भी धर्मराजकी सभामें जाता है॥ ८६ ॥

अध्याय समाप्ति

॥ इस प्रकार गरुडपुराणके अन्तर्गत सारोद्धारमें 'धर्मराजनगरनिरूपण' नामक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥१४॥ 


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Hari Krishna Regmi

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I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.