तेरहवाँ अध्याय गरुडपुराण (सारोद्धार) – सपिण्डन विधि, सूतक निर्णय एवं शय्यादान
अशौचकालका निर्णय, अशौचमें निषिद्ध कर्म, सपिण्डीकरणश्राद्ध, पिण्डमेलनकी प्रक्रिया, शय्यादान, पददान तथा गयाश्राद्धकी महिमा
यमलोक एवं यम-सभाका वर्णन, चित्रगुप्त आदिके भवनोंका परिचय,धर्मराजनगरके चार द्वार, पुण्यात्माओंका धर्मसभामें प्रवेश
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गरुडजीने कहा-हे दयानिधे! यमलोक कितना बड़ा है, कैसा है, किसके द्वारा बनाया हुआ है, वहाँकी सभा कैसी है और उस सभामें धर्मराज किनके साथ बैठते हैं? ॥ १॥
हे दयानिधे! जिन धर्मोंका आचरण करनेके कारण धार्मिक पुरुष जिन धर्ममार्गोंसे धर्मराजके भवनमें जाते हैं, उन धर्मों तथा मार्गोंके विषयमें भी आप मुझे बतलाइये॥२॥
श्रीभगवान्ने कहा-हे गरुड! धर्मराजका जो नगर नारदादि मुनियोंके लिये भी अगम्य है उसके विषयमें बतलाता हूँ, सुनो। उस दिव्य धर्मनगरको महापुण्यसे ही प्राप्त किया जा सकता है॥३॥
दक्षिण दिशा और नैर्ऋत्यकोणके मध्यमें वैवस्वत (यम)-का जो नगर है, वह सम्पूर्ण नगर वज्रका बना हुआ है, दिव्य है और असुरों तथा देवताओंसे अभेद्य है॥४॥
वह पुर चौकोर, चार द्वारोंवाला, ऊँची चहारदीवारीसे घिरा हुआ और एक हजार योजन प्रमाणवाला कहा गया है॥५॥
उस पुरमें चित्रगुप्तका सुन्दर मन्दिर है, जो पचीस योजन लम्बाई और चौड़ाईमें फैला हुआ है॥६॥
वे मनुष्योंके पाप और पुण्यका लेखा-जोखा (अभिलेख) करनेमें त्रुटि नहीं करते। जिसने जो शुभ अथवा अशुभ कर्म किया है, चित्रगुप्तकी आज्ञासे उसे उन सबका भोग करना होता है ॥ ११-१३॥
चित्रगुप्तके भवनसे बीस योजन आगे नगरके मध्यभागमें धर्मराजका महादिव्य भवन है। वह दिव्य रत्नमय तथा विद्युत्की ज्वालामालाओंसे युक्त और सूर्यके समान देदीप्यमान है॥१६-१७॥
उस (धर्मराजके) भवनमें सौ योजन लम्बी-चौड़ी दिव्य सभा है जो सूर्यके समान प्रकाशित, चारों ओरसे देदीप्यमान तथा इच्छानुसार स्वरूप धारण करनेवाली है॥२४॥
दस योजन विस्तीर्ण और सभी प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित उस सभामें अनुपम एवं उत्तम आसनपर धर्मराज विद्यमान रहते हैं ॥ ३१॥
अत्रि, वसिष्ठ, पुलह, दक्ष, क्रतु, अंगिरा, जमदग्निनन्दन परशुराम, भृगु, पुलस्त्य, अगस्त्य, नारद-ये तथा अन्य बहुत-से पितृराज (धर्मराज)-के सभासद हैं ॥३९-४० ॥
धर्मराजके पुरमें जानेके लिये चार मार्ग हैं। पापियोंके गमनके लिये जो मार्ग है उसके विषयमें मैंने तुमसे पहले ही कह दिया॥४८-४९ ॥
सत्य और धर्ममें रहनेवाले, क्रोध और लोभसे रहित, पिता-मातामें भक्ति रखनेवाले… ये सभी सुशील और शुद्ध बुद्धिवाले धर्मराजकी सभामें जाते हैं ॥ ५६–५८॥
इस मार्गसे वैदिक, अभ्यागतोंकी पूजा करनेवाले, दुर्गा और सूर्यके भक्त… वे व्यक्ति उत्तरद्वारसे धर्मसभामें जाते हैं ॥ ६३-६४॥
इस मार्गसे आत्मतत्त्ववेत्ता, सत्-शास्त्रोंके परिचिन्तक, भगवान् विष्णुके अनन्य भक्त… वे उस भवनके पश्चिम द्वारसे प्रविष्ट होकर धर्मसभामें पहुँचते हैं ॥६९-७३ ॥
अस्थिर शरीरसे और अस्थिर धन आदिसे कोई एक बुद्धिमान् मनुष्य ही स्थिर धर्मका संचयन करता है। इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नोंको करके धर्मका संचय करना चाहिये ॥७७-८१ ॥
ऐसा धर्मराजका वचन सुनकर वे देवताओंके द्वारा पूजित होकर विमानसमूहोंसे परम पदको जाते हैं ॥ ८२-८३॥
और वहाँ एक कल्पपर्यन्त रहकर पुण्य-दर्शनवाले मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है ॥ ८४॥
(हे गरुड!) तुमने यमलोकके विषयमें पूछा था, वह सब मैंने बता दिया, इसको भक्तिपूर्वक सुननेवाला व्यक्ति भी धर्मराजकी सभामें जाता है॥ ८६ ॥
॥ इस प्रकार गरुडपुराणके अन्तर्गत सारोद्धारमें 'धर्मराजनगरनिरूपण' नामक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥१४॥
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I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.
अशौचकालका निर्णय, अशौचमें निषिद्ध कर्म, सपिण्डीकरणश्राद्ध, पिण्डमेलनकी प्रक्रिया, शय्यादान, पददान तथा गयाश्राद्धकी महिमा
धर्मात्मा-जनका दिव्यलोकोंका सुख भोगकर उत्तम कुलमें जन्म लेना, शरीरके व्यावहारिक तथा पारमार्थिक दो रूपोंका वर्णन, अजपाजपकी विधि, भगवत्प्राप्तिके साधनोंमें भक्तियोगकी प्रधानता
मनुष्य-शरीर प्राप्त करनेकी महिमा, धर्माचरण ही मुख्य कर्तव्य, शरीर और संसारकी दुःखरूपता तथा नश्वरता, मोक्ष-धर्म-निरूपण
