त्रयोविंश अध्याय – धनुर्दास | श्रीरामानुजाचार्य जीवन कथा
धनुर्दास और उनकी पत्नी हेमाम्बा की भक्ति, श्रीरामानुजाचार्य की कृपा, गरुड़-महोत्सव में घटनाएँ, गुण और ब्राह्मण धर्म का महत्व।

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गोविन्द द्वारा सुनाई गई भयावह और हृदय-कंपा देने वाली अशुभ बातों से श्रीरामानुज कुछ क्षण हेतु स्तब्ध हो गए। आँखों के आगे अंधकार-सा छा गया। कुछ देर बाद उन्होंने देखा कि उनका प्रिय सखा गोविन्द भी उन्हें छोड़कर तेजी से यादवप्रकाश के शिष्यों की ओर लौट रहा है।
अठारह वर्ष का एक युवक—वह भी निर्जन वन में—बिना कोई सहारा, बिना किसी साथी के क्या कर सकता था?
यह सोचकर श्रीरामानुज ने मन में विचार किया कि गोविन्द को पुकारें, पर ऐसा करने से यादव के शिष्य और अधिक शंका कर बैठेंगे। इसी विचार से गोविन्द भी रामानुज को छोड़कर चला गया था। धीरे-धीरे वह वृक्षों की आड़ में ओझल हो गया।
इसी समय श्रीरामानुज के भीतर एक अदृश्य शक्ति जागृत हुई—मानो कोई कह रहा हो,
“डर मत, नारायण स्वयं रक्षक हैं।”
भयभीत करने वाले सहपाठियों से बचने के लिए श्रीरामानुज मार्ग छोड़कर घोर वन में प्रवेश कर गए। वे दोपहर तक लगातार चलते रहे, एक बार भी पीछे मुड़कर न देखा। तभी उन्हें लगा कि कोई जोर-जोर से पुकार रहा है, पर वे और तेजी से आगे बढ़ गए।
अंततः भूख, प्यास और थकान से उनका शरीर चूर हो गया। एक वृक्ष के नीचे बैठते ही उनकी चेतना मानो शांत हो गई और वे गहरी निद्रा में डूब गए। कुछ देर के लिए संसार के सुख-दुःख से मुक्ति मिल गई।
जब वे जागे तो सूर्य अस्त होने को था। आश्चर्य—उन्हें न भूख रही, न प्यास! शरीर में पहले से अधिक शक्ति का अनुभव हुआ। उन्होंने भगवान त्रितापहारी (दुख-हरण करने वाले) को धन्यवाद किया।
तभी सामने एक व्याध (शिकारी) और उसकी पत्नी दिखाई दिए।
व्याध की पत्नी आदर से बोली—
“बेटा, तुम इस सुनसान जंगल में कैसे आ गए? तुम तो ब्राह्मण हो। तुम्हारा घर कहाँ है?”
श्रीरामानुज ने कहा—
“हमारा घर कांचीपुरी में है, यहाँ से बहुत दूर।”
यह सुनकर व्याध बोला—
“इस भयावह वन में कोई दिन में भी आने का साहस नहीं करता। यह चोर-डकैतों और हिंसक पशुओं से भरा है। हम कांचीपुरी जाने वाले ही हैं। तुम्हें अकेला देखकर तुम्हारा हाल जानने आए।”
रामानुज ने पूछा—
“आप लोग कौन हैं? कांची क्यों जा रहे हैं?”
व्याध ने उत्तर दिया—
“हम सिद्धाश्रम के रहने वाले हैं। जीवन भर व्याध-व्यवसाय किया। अब तीर्थयात्रा और कल्याण की इच्छा से निकले हैं। पहले कांचीपुरी और फिर सेतु (रामेश्वरम्) जाएँगे। तुम जैसे सत्पुरुष का साथ बड़ा शुभ है। भय मत करो—परमात्मा ने ही हमें तुम्हारी सहायता के लिए भेजा है।”
व्याध का भयंकर रूप देखकर रामानुज पहले थोड़ा भयभीत हुए, पर उसकी गंभीर, स्नेहिल वाणी, पत्नी का सरल व्यवहार और दिव्य सद्भाव देखकर उनके हृदय में पूर्ण विश्वास बैठ गया।
सूर्य अस्त होने को था, अतः व्याध बोला—
“चलो, जल्दी इस वन को पार कर लें।”
कुछ देर बाद वे वन से बाहर निकले। व्याध ने लकड़ी लाकर आग जलाई, भूमि समतल की और रामानुज से कहा कि वे वहीं विश्राम करें। व्याध और उसकी पत्नी भी थोड़ी दूरी पर विश्राम करने लगे।
व्याध की पत्नी बोली—
“मुझे बहुत प्यास लगी है। क्या यहाँ कहीं जल मिलेगा?”
व्याध बोला—
“रात में बाहर जाना उचित नहीं। थोड़ी दूरी पर एक बावड़ी है—सुबह वहीं चलेंगे।”
अगले दिन प्रातः श्रीरामानुज व्याध दम्पति के साथ उस बावड़ी पर पहुँचे। उन्होंने हाथ-पाँव धोकर जल पिया और व्याध की पत्नी को भी अंजलि में जल पिलाया। उसकी प्यास न बुझने पर वे फिर जल लेने गए।
जब चौथी बार जल लेकर लौटे—
न व्याध था, न उसकी पत्नी!
दोनों पल में अदृश्य हो चुके थे।
श्रीरामानुज स्तब्ध रह गए।
हृदय ने कहा—
“ये मनुष्य नहीं—लक्ष्मीनारायण ने ही हमारे लिए व्याध-दम्पति रूप धारण किया।”
बावड़ी से थोड़ा आगे उन्हें मंदिरों के शिखर और विशाल भवन दिखाई दिए। एक पथिक से पूछा—
“भाई, यह कौन सा नगर है?”
वह आश्चर्य से बोला—
“प्रसिद्ध काञ्चीपुरी! और तुम तो महात्मा यादवप्रकाश के शिष्य हो। यह बावड़ी शालकूप कहलाती है—इसके जल से तीनों ताप नष्ट होते हैं।”
पथिक चला गया।
रामानुज चकित रह गए—
वह जंगल कहाँ गया?
वह व्याध दम्पति कहाँ गए?
यह सब कैसे हुआ?
अब उनके मन में स्पष्ट हुआ—
“यह सब श्री लक्ष्मीनारायण की करुणा से हुआ।”
वे भाव-विह्वल होकर रो पड़े, हृदय पिघल गया, और हाथ जोड़कर बोले—
“नमो ब्रह्मण्य देवाय गो-ब्राह्मण हिताय च।
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमोनमः॥”
I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.
धनुर्दास और उनकी पत्नी हेमाम्बा की भक्ति, श्रीरामानुजाचार्य की कृपा, गरुड़-महोत्सव में घटनाएँ, गुण और ब्राह्मण धर्म का महत्व।
विशिष्टाद्वैत वेदांत के अनुसार जीव, प्रकृति और परब्रह्म के स्वरूप, कारण और परिणाम, जीवों का तिरोहित स्वरूप, तथा मोक्ष और भक्ति का मार्ग।
श्रीरामानुजाचार्य द्वारा रचित प्रमुख ग्रन्थों का परिचय एवं विवरण। वेदार्थ संग्रह, वेदान्तसार, वेदान्त दीप, श्रीभाष्य, गीता भाष्य, गद्यत्रय, नित्याराधन।
