द्वादशदिव्य सूरी और दस पूर्वाचार्य
द्वादश दिव्य सूरी और दस पूर्वाचार्यों के नाम और विवरण। श्रीरामानुजाचार्य के प्रमुख शिष्यों और आलवारों की नामावली।
श्रीरामानुजाचार्य द्वारा रचित प्रमुख ग्रन्थों का परिचय एवं विवरण। वेदार्थ संग्रह, वेदान्तसार, वेदान्त दीप, श्रीभाष्य, गीता भाष्य, गद्यत्रय, नित्याराधन।
श्रीमज्जगद्गुरु रामानुजाचार्य के पश्चात् भी कपितय आचार्य श्रीरामानुज के नाम से हुए हैं। जैसे आत्रेय रामानुज, रंग रामानुज, रामानुज 'द्वितीय', वादि हंसाम्बुजाचार्य अष्टदिग्गज परिगणित कुन्तीनगरस्थ रामानुजाचार्य इत्यादि। इन आचार्यों ने भी विविध ग्रन्थों की रचना की थी। उन सभी ग्रन्थों को जोड़-बटोर कर किसी लेखक ने तो श्रीरामानुजाचार्य के ग्रन्थों की संख्या ४० से भी अधिक बतलाई है। किन्तु वास्तव में प्रथम भाष्यकार श्रीरामानुजाचार्य के बनाए हुए ग्रन्थ ७ ही हैं।
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कौन ग्रन्थ किस समय बनाया गया इसका ठीक पता नहीं चलता। इन ग्रन्थों का परिचय संक्षेपतः इस प्रकार है :-
यह श्री आचार्य चरण की प्रथम रचना है। आपाततः प्रसादगुण युक्त किन्तु तत्वतः गम्भीर। यह ग्रन्थ श्रुति सिद्धान्त के निर्धारण में अद्वितीय है। जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के व्याज से समस्त चेतनों के उद्धार के हेतु श्रीमद्भगवद्गीताका उपदेश दिया था, वैसे ही भगवान भाष्यकार ने "उच्च कोंडार" नामक द्राविड़ विद्वान को लक्ष्य कर निखिल जीवों के उद्धारार्थ एवं उपनिषद् वाक्यों का अन्तिम तात्पर्य जानने के लिए "वेदार्थ संग्रह" नामक ग्रन्थ का उपन्यास किया।
इस ग्रन्थ में आचार्य ने श्रुति, स्मृति, पुराणेतिहास, पांचरात्र प्रमाणित श्री विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त का समर्थन करते हुए उस समय के प्रचलित श्री शंकर मत, श्री यादवप्रकाश मत और भाष्कर मत नामक तीन वेदान्त मतों का अकाट्य खंडन किया है। अन्त में समस्त श्रुति स्मृति पंचरात्र के वचनों की एकवाक्यता श्री विशिष्टाद्वैत में ही है यह प्रतिपादन किया गया है।
श्रीरामानुजाचार्य द्वारा रचित यह ग्रन्थ वेदान्त सूत्रों पर विस्तृत भाष्य है। इस ग्रन्थ का परिचय देना सूर्य को दीपक दिखाना है। वेदान्त विद्वानों में इसका आसन बहुत ऊंचा है। आचार्य की रचनाओं में यह ग्रन्थ रत्न अर्थ की दृष्टि से जितना गम्भीर है, उतना ही आकार प्रकार के विचार से भी महान् है।
श्री भाष्य में अद्वैतवाद आदि सिद्धान्तों के खंडन में गहन तत्वों की अवतारणा की गई है। ब्रह्मसूत्रों पर श्री रामानुजाचार्य की व्याख्या 'शारीरिक मीमांसा भाष्य' कहलाती है।
श्री भाष्य की टीकाएँ:
इसमें ब्रह्मसूत्रों की संक्षिप्त व्याख्या है। इसमें सूत्राक्षरों की व्याख्या पर दृष्टि न रख कर संक्षेपतः वेदान्त सिद्धान्तों के प्रतिपादन पर ही अधिक ध्यान दिया गया है।
भक्तवत्सल श्रीरामानुजाचार्य ने वेदान्त तत्व के प्रारम्भिक जिज्ञांसु एवं कोमल मति विद्यार्थियों के लिये इस ग्रन्थ की रचना की थी। ब्रह्मसूत्र के पढ़नेवालों को प्रथम वेदान्त दीप का अध्ययन करना चाहिए, इसके बाद वेदान्तसार, फिर श्री भाष्य।
श्रीमद्भागवत गीता के १८ अध्यायों पर यह संक्षिप्त भाष्य है। थोड़े शब्दों में गीता के तत्वों को प्रकट करने वाली इसकी कोई समकक्ष व्याख्या नहीं है।
इसमें "शरणागति गद्यम्", 'श्री रंग गद्यम्', 'श्री वैकुण्ठ गद्यम्' के तीन छोटे-छोटे स्वतन्त्र प्रबन्ध हैं। भाषा भक्तों के हृदय में भगवद्भक्ति का सिन्धु उमड़ने वाली है।
यह ग्रन्थ गद्यत्रय से आकार में कुछ बड़ा है। प्रातःकाल उठकर एकान्ती श्रीवैष्णवों को नित्य कृत्य करने के बाद भगवान की आराधना किस प्रकार करनी चाहिए, यही इसका प्रतिपाद्य विषय है।
वेदार्थ संग्रह, वेदान्तसार, वेदान्त दीप, श्रीभाष्य, "शारीरिक मीमांसा भाष्य", नित्याराधन – ये ही श्रीरामानुजाचार्य प्रणीत ग्रन्थ हैं।
"तस्मै रामानुजाचार्य नमः परम योगिने। यः श्रुति स्मृति सूत्राणामन्तर्ध्वरमशीशमत्।"
I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.
द्वादश दिव्य सूरी और दस पूर्वाचार्यों के नाम और विवरण। श्रीरामानुजाचार्य के प्रमुख शिष्यों और आलवारों की नामावली।
धनुर्दास और उनकी पत्नी हेमाम्बा की भक्ति, श्रीरामानुजाचार्य की कृपा, गरुड़-महोत्सव में घटनाएँ, गुण और ब्राह्मण धर्म का महत्व।
विशिष्टाद्वैत वेदांत के अनुसार जीव, प्रकृति और परब्रह्म के स्वरूप, कारण और परिणाम, जीवों का तिरोहित स्वरूप, तथा मोक्ष और भक्ति का मार्ग।
