त्रयोविंश अध्याय – धनुर्दास | श्रीरामानुजाचार्य जीवन कथा
धनुर्दास और उनकी पत्नी हेमाम्बा की भक्ति, श्रीरामानुजाचार्य की कृपा, गरुड़-महोत्सव में घटनाएँ, गुण और ब्राह्मण धर्म का महत्व।
इस अध्याय में श्रीरामानुज की विनम्रता, गोविन्द का शिव-भक्ति मार्ग, आलवंदार का दर्शन, राजकुमारी का भूत-निवारण और वेदान्त चर्चा के कारण रामानुज-यादवप्रकाश मतभेद का वर्णन मिलता है। यह अध्याय उनके आध्यात्मिक तेज और विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त की भूमिका प्रस्तुत करता है।
तीन महीने बाद यादवप्रकाश अपने सभी शिष्यों के साथ काञ्ची लौट आए। सभी आ गए—केवल गोविन्द को छोड़कर। घर पहुँचकर माता दीप्तिमती को पता चला कि विन्ध्याचल के अरण्य में रामानुज से बिछड़ने के बाद तीर्थयात्री काशी पहुँचे और वहाँ से आगे बढ़ते रहे।
गंगा-स्नान के समय गोविन्द को जल में से एक सुन्दर वाणलिङ्ग मिला। यादवप्रकाश ने इसे शिव-कृपा का अद्भुत संकेत माना और गोविन्द को शिव-सेवा में लग जाने का उपदेश दिया। धीरे-धीरे गोविन्द की भक्ति इतनी प्रबल हुई कि उन्होंने घोषणा की—
“मैं शेष जीवन शिव-सेवा में ही बिताऊँगा।”
वे मङ्गल-ग्राम में बस गए और वहीं आराधना में जीवन समर्पित कर दिया। समाचार सुनकर माता दीप्तिमती ने पुत्र-वियोग नहीं, बल्कि भक्ति-धन पर हर्ष किया। योगिनी की अनुमति लेकर वे पुत्र से मिलने गयीं और उसे आशीर्वाद देकर लौट आईं।
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उधर यादवप्रकाश ने पुनः अध्यापन शुरू किया। रामानुज को देखकर उन्हें भीतर से भय भी था और अपराध-बोध भी; क्योंकि रामानुज को नष्ट करने की पुरानी दुष्चेष्टा उनका मन याद कर रहा था।
फिर भी वे बोले—
“बेटा, तुम जीवित वापस आए—इससे बड़ा सुख क्या होगा!”
रामानुज ने विनम्रतापूर्वक कहा—
“सब आपकी कृपा है।”
रामानुज की नम्रता ने उनके हृदय में लज्जा को और गहरा कर दिया।
कुछ दिन बाद वृद्ध आलवन्दार (यामुनाचार्य) वरदराज के दर्शन हेतु काञ्ची आए। जाते समय उन्होंने रामानुज को देखा—तेजस्वी, सौम्य, सौन्दर्यमय।
ज्ञात हुआ कि “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” की विस्तृत व्याख्या भी यही युवक कर चुका है। आलवन्दार अत्यन्त प्रसन्न हुए, पर जब देखा कि इतना पवित्र तेजस्वी युवक अद्वैतवादी यादवप्रकाश के समीप बैठा है, तो हृदय द्रवित हो गया और उन्होंने भीतर-ही-भीतर वरदराज से प्रार्थना की—
“हे नाथ, रामानुज पर कृपा कर, उसे अपने मत में प्रवेश दिलाओ।”
आलवन्दार बात करना चाहते थे, पर उन्होंने प्रतीक्षा को ही उचित समझा और आगे श्रीरंगम् के लिए बढ़ गए।
भूत-प्रेत-पीड़ित लोगों को वे मन्त्र-बल से स्वस्थ करते थे।
इसी समय काञ्ची-राजकुमारी भूत-पीड़ित हुई। अनेक मन्त्रविद बुलाए गए—कोई सफल न हुआ। अंततः यादवप्रकाश को बुलाया गया।
राजकुमारी में स्थित भूत यादव को देखकर हँसा और बोला—
“तुम कहाँ सफल हो पाओगे? तुम्हारी मंत्र-शक्ति मेरे लिए तुच्छ है। जाओ, घर लौटो!”
यादवप्रकाश ने एक पहर तक मन्त्र किया—कोई फल नहीं।
तब भूत बोला—
“यदि सचमुच मुझे हटाना चाहते हो, तो अपने उस युवा शिष्य को बुलाओ—
विस्तृत ललाट, आजानुबाहु, तेजोमय—रामानुज।
जिस प्रकार सूर्य से अंधकार मिटता है, उसके दर्शन मात्र से मैं हट जाऊँगा।”
यादव ने तुरंत रामानुज को बुलाया। वे आए।
भूत ने विनती की—
“मेरे सिर पर अपना चरण रख दीजिये। तभी मैं राजकुमारी को छोड़ूँगा।”
रामानुज ने गुरु-आज्ञा से ऐसा किया और कहा—
“राजकुमारी को छोड़ दो। और छोड़ने का प्रमाण भी दो।”
भूत बोला—
“उस पीपल-वृक्ष की शाखा तोड़ता हूँ—यह प्रमाण है।”
क्षण भर में शाखा टूट गयी, और राजकुमारी निद्रा से जागने जैसी स्थिति में स्वस्थ हो गई।
राजा ने आकर यादव और रामानुज दोनों का सम्मान किया। इसी घटना से रामानुज का नाम दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गया।
इसके बाद पुनः अध्यापन चलता रहा। एक दिन “सर्व खल्विदं ब्रह्म” और “नेह नानास्ति किञ्चन” मंत्रों की व्याख्या के समय यादवप्रकाश ने अद्वैत का प्रतिपादन किया।
सभी शिष्य प्रसन्न हुए—केवल रामानुज को छोड़कर।
पाठ समाप्त होने पर रामानुज ने विनम्रता से कहा—
“जगत् ब्रह्म से उत्पन्न, ब्रह्म से स्थित और ब्रह्म में लीन होता है—
परन्तु मछली जल से उत्पन्न होकर भी जल नहीं हो सकती।
उसी प्रकार जगत् ब्रह्ममय है—पर ब्रह्म नहीं है।”
और “नेहानानास्ति किञ्चन” की व्याख्या की—
“इसका अर्थ यह नहीं कि भिन्न वस्तुएँ नहीं हैं; बल्कि यह है कि सब वस्तुएँ ब्रह्म-सूत्र में पिरोए मोतियों की तरह एक तंत्र में बँधी हैं।”
यह सुनकर यादवप्रकाश क्रोधित हो गया और बोला—
“यदि मेरी व्याख्या तुम्हें अच्छी नहीं लगती, तो यहाँ मत आया करो।”
रामानुज ने शांत भाव से प्रणाम किया और घर लौट आए।
I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.
धनुर्दास और उनकी पत्नी हेमाम्बा की भक्ति, श्रीरामानुजाचार्य की कृपा, गरुड़-महोत्सव में घटनाएँ, गुण और ब्राह्मण धर्म का महत्व।
विशिष्टाद्वैत वेदांत के अनुसार जीव, प्रकृति और परब्रह्म के स्वरूप, कारण और परिणाम, जीवों का तिरोहित स्वरूप, तथा मोक्ष और भक्ति का मार्ग।
श्रीरामानुजाचार्य द्वारा रचित प्रमुख ग्रन्थों का परिचय एवं विवरण। वेदार्थ संग्रह, वेदान्तसार, वेदान्त दीप, श्रीभाष्य, गीता भाष्य, गद्यत्रय, नित्याराधन।
