• 02 Apr, 2026

द्वाविंश अध्याय – कूरेश | श्रीरामानुजाचार्य जीवन कथा

द्वाविंश अध्याय – कूरेश | श्रीरामानुजाचार्य जीवन कथा

कूरेश की जीवनी, कूरेश और उनकी पत्नी आण्डाल की भक्ति, श्रीरामानुजाचार्य के प्रति उनकी सेवा, नवजात शिष्यों का नामकरण, बालक पराशर की अलौकिक प्रतिभा।

द्वाविंश अध्याय – कूरेश

कूरेश का परिचय

उत्तमपूर्ण नामक श्रीरंगनाथ के एक सेवक ने 'लक्ष्मीकाव्य' में कूरेश की जीवनी का वर्णन किया है। कूरेश वात्स्य गोत्रोत्पन्न धनाढ्य ब्राह्मण थे। काञ्चीपुर के दो कोस पश्चिम कूरआग्रहार में रहते थे। उनकी पत्नी का नाम आण्डाल था। बाल्यावस्था से ही उनकी भक्ति श्रीरामानुज में थी। कूरेश और उनकी पत्नी संन्यास ग्रहण करने के बाद श्रीरामानुज के शिष्य बने और सदैव उनके समीप रहते थे।

कूरेश का त्याग और श्रीरंगम् आगमन

कूरेश की बड़ी हवेली में प्रातःकाल से लेकर आधी रात तक दीन-दरिद्रों की सेवा होती थी। श्रीवरदराज की पत्नी जगन्माता लक्ष्मी ने एक रात्रि इस सेवा की जानकारी प्राप्त की। कूरेश ने अपने आभूषण उतारकर पीताम्बर की जगह पुराने वस्त्र पहने और स्नान हेतु वन की ओर चले। उनकी पत्नी आण्डाल भी अपने साथ जल और सुवर्ण-पात्र लेकर चली।

दूसरे दिन कूरेश दम्पति श्रीरंगम् पहुँचे। यतिराज ने उन्हें मठ में स्थान दिया और स्नान व भोजन कराकर आराम करवाया। कूरेश ने भिक्षाटन और भगवान् के नाम का कीर्तन करके समय व्यतीत किया। आण्डाल पति की सेवा में लगी रही और उन्हें भोजन ग्रहण करवाने का उपाय किया।

नवजात शिष्यों का जन्म और संरक्षण

आण्डाल ने ९८३ शाके के वैशाख महीने की पूर्णिमा को दो पुत्र जन्म दिए। श्रीरामानुज ने गोविन्द को नवजात शिष्यों का जातकर्म कराकर उन्हें शुद्ध किया। बालकों को राक्षस, भूत, पिशाच आदि से रक्षा हेतु भगवान् विष्णु के पाँचास्त्र (पाञ्चजन्य, सुदर्शन, कौमोदकी, नन्दक, शङ्ग) बनाए। बालकों का नामकरण संस्कार ग्यारहवें दिन हुआ। बड़े पुत्र का नाम पराशरभट्ट और कनिष्ठ का नाम श्रीराम रखा।

बालक पराशर की अलौकिक प्रतिभा

पराशर बाल्यावस्था से ही अद्वितीय प्रतिभा दिखाने लगा। चार वर्ष की अवस्था में उसने सर्वज्ञ भट्टा पण्डित से प्रश्न किया: "हमारी अङ्गुलिमें कितनी धूलि है?" सर्वज्ञ पण्डित उनकी बुद्धि से चकित हुए और उसे गोदी में उठाकर सम्मान किया।

श्रीरंगनाथस्वामी का प्रसाद-भोजन बालकों के जन्म का कारण माना गया। पराशर और श्रीराम उनके पुत्र माने गए। उपनयन अनन्तर गोविन्द ने पराशर से भगवान् के 'अणोरणीयान् महतो महीयान्' गुणों का उपदेश दिया।

Hari Krishna Regmi

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I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.