• 29 Mar, 2026

सप्तविंश अध्याय – कूरेश | श्रीरामानुजाचार्य जीवन कथा

सप्तविंश अध्याय – कूरेश | श्रीरामानुजाचार्य जीवन कथा

सप्तविंश अध्याय में श्रीरामानुजाचार्य, परम भक्त कूरेश की भक्ति, ज्ञानचक्षु प्राप्ति और भगवान श्रीवरदराज की कृपा का विस्तृत वर्णन।

सप्तविंश अध्याय – कूरेश

कूरेश की भक्ति और आराधना

भक्ताग्रणी राजकुमार श्रीक्षेत्र के लिए प्रस्थान करने पर, कूरेश नामक परम भक्त, अपनी पत्नी और पुत्र के साथ भगवान सुंदरबाहु की पूजा हेतु बनाल नामक स्थान पर गए। वहाँ उन्होंने कुछ दिनों तक निवास करते हुए ‘श्रीस्तव’, ‘सुंदरबाहुस्तव’, ‘अतिमानुषस्तव’ और ‘वैकुण्ठस्तव’ की रचना की।

श्रीरामानुज का संदेश और कूरेश का आत्मसमर्पण

यादवाद्रि में रहते हुए श्रीरामानुज ने सुना कि कूरेश अपने शत्रुओं का मङ्गल मानकर आनंदित हैं, परन्तु स्वयं के लिए उन्होंने कोई स्वार्थ प्रयास नहीं किया। श्रीरामानुज ने अपने एक शिव्य के माध्यम से कूरेश से कहा कि वे भगवान श्रीवरदराज से अपनी आंखें मांगें, क्योंकि उनके शरीर, मन और प्राण सभी भगवान के हैं। कूरेश ने इस आज्ञा को सुनकर आनंदित होकर कहा कि वे शीघ्र ही अपनी आंखें श्रीवरदराज से प्राप्त करेंगे।

ज्ञानचक्षु प्राप्ति और आनंद

कूरेश भगवान की आनंदमयी मूर्ति के समीप जाकर स्तुति करने लगे। भगवान ने उन्हें दिव्य नेत्रद्वय प्रदान किए, जिससे उनके पवित्र देह की शोभा बढ़ी और उनका इष्टदेव आनंदित हुआ। कूरेश के आत्म-ज्ञान शून्य हो गए और वे हाथ जोड़कर बोले: "भगवन्! आपकी लीला, सृष्टि, रक्षा और प्रलयकारिणी निद्रा सभी आनन्दमयी हैं। आज आपकी कृपासे मेरा अज्ञान दूर हुआ।" इस पर वे आनन्द में उन्मत्त होकर नाचने लगे। उनकी भक्ति ने भगवान और उपस्थित भक्तों पर गहरा प्रभाव डाला।

अभीष्ट वर की प्राप्ति और परिवार की मुक्ति

एक दिन भगवान ने कूरेश को प्रसन्न होकर अभीष्ट वर मांगने को कहा। कूरेश ने परमपद की प्रार्थना की। भगवान ने न केवल उन्हें, बल्कि उनके सगे-संबंधियों को भी मुक्ति देने की घोषणा की। यह देखकर श्रीरामानुज स्वामी अत्यंत प्रसन्न हुए और आनंद में नाच उठे।

कूरेश की भक्ति का संदेश

कूरेश की कथा हमें यह सिखाती है कि:

  • भक्त का समर्पण और आत्मसमर्पण सर्वोपरि है।
  • भक्ति से भगवान प्रसन्न होते हैं और भक्त को दिव्य ज्ञान और कृपा प्राप्त होती है।
  • भक्त केवल अपने लिए नहीं, अपितु अपने परिवार और संबंधियों के कल्याण हेतु भी वर प्राप्त कर सकता है।
  • सच्चे भक्त की भक्ति जाति, कुल और रूप से परे होती है।

 

इस प्रकार, कूरेश ने भगवान श्रीवरदराज से दिव्य नेत्र प्राप्त कर और अपने परिवार सहित परमपद प्राप्त कर जीवन को धन्य किया। उनकी भक्ति और ज्ञानचक्षु की प्राप्ति से सभी भक्त प्रभावित हुए और श्रीरामानुज स्वामी ने उन्हें आदरपूर्वक सम्मानित किया।

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Hari Krishna Regmi

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I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.