उत्तरायण का महत्व और शुभ मुहूर्त | धार्मिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक अर्थ
उत्तरायण का महत्व, शुभ मुहूर्त, धार्मिक व वैज्ञानिक कारण, क्या करें-क्या न करें, सूर्य उपासना और आध्यात्मिक लाभ विस्तार से जानें।
पौष मास शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी व्रत 2025 की तिथि, संपूर्ण व्रत कथा, पूजा विधि, मंत्र, लाभ और संतान प्राप्ति का माहात्म्य पढ़ें।
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पुत्रदा एकादशी पौष मास के शुक्ल पक्ष में आती है। वर्ष 2025 में यह एकादशी 30 दिसेम्बर 2025 में पड़ेगी (पौष शुक्ल एकादशी)।
⚠️ तिथि स्थानानुसार घट-बढ़ सकती है, अतः पारण अपने क्षेत्रीय पंचांग से अवश्य देखें।
पुत्रदा एकादशी का व्रत संतान प्राप्ति, वंश वृद्धि, पितृ तृप्ति और समस्त पापों के नाश के लिए किया जाता है। इस तिथि के अधिदेवता भगवान नारायण (श्रीविष्णु) हैं।
धर्मशास्त्रों के अनुसार:
युधिष्ठिर बोले- श्रीकृष्ण ! आपने शुभकारिणी 'सफला' एकादशी का वर्णन किया। अब कृपा करके शुक्ल पक्ष की एकादशी का महत्व बतलाइये। उसका क्या नाम है ? कौन सी विधि है? तथा उसमें किस देवता का पूजन किया जाता है ?
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-राजन् ! पौष के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी है, उसे बतलाता हूं, सुनो। महाराज! संसार के हित की इच्छा से मैं इसका वर्णन करता हूँ। राजन् ! पूर्वोक्त विधि से ही यत्न पूर्वक इसका व्रत करना चाहिये। इसका नाम 'पुत्रदा' है यह सब पापों को हरने वाली उत्तम तिथि है। समस्त कामनाओं तथा सिद्धियों के दाता भगवान् नारायण इस तिथि के अधिदेवता है। चराचर प्राणियों सहित समस्त त्रिलोकी में इससे बढ़कर दूसरी तिथि नहीं है। पूर्वकाल की बात है, भद्रावती पुरी में राजा सुकेतुमान् राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम चम्पा था। राजा को बहुत समय तक कोई वंशधर पुत्र नहीं प्राप्त हुआ। इसलिए दोनों पति-पत्नी सदा चिन्ता और शोक में डूबे रहते थे। राजा के पितर उनके दिये हुए जल को शोकोच्छ् वास से गरम करके पीते थे। 'राजा के बाद और कोई ऐसा नहीं दिखायी देता, जो हम लोगों का तर्पण करेगा, यह सोच-सोचकर पितर दुखी रहते थे।'
एक दिन राजा घोड़े पर सवार हो गहन वन में चले गये। पुरोहित आदि किसी को भी इस बात का पता न था। मृग और पक्षियों से सेवित उस सघन वन में राजा भ्रमण करने लगे। मार्ग में कहीं सियार की बोली सुनायी पड़ती थी तो कहीं उल्लुओं की। जहां-तहां रीछ और मृग दृष्टिगोचर हो रहे थे। इस प्रकार घूम-घूमकर राजा वन की शोभा देख रहे थे, इतने में दोपहर हो गया। राजा को भूख और प्यास सताने लगी। वे जल खोज में इधर-उधर दौड़ने लगे। किसी पुण्य के प्रभाव से उन्हें एक उत्तम सरोवर दिखायी दिया, जिसके समीप मुनियों के बहुत से आश्रम थे। शोभाशाली नरेश ने उन आश्रमों की ओर देखा। उस समय शुभ की सूचना देने वाले शुकुन होने लगे। राजा का दाहिना नेत्र और दाहिना हाथ फड़कने लगा, जो उत्तम फल की सूचना दे रहा था। सरोवर के तट पर बहुत से मुनि वेद-पाठ कर रहे थे। उन्हें देखकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ। वे घोड़े से उतरकर मुनियों के सामने खड़े हो गये और पृथक् पृथक् उन सबकी वन्दना करने लगे। वे मुनि उत्तम व्रत का पालन करने वाले थे। जब राजा ने हाथ जोड़कर बारंबार दण्डवत् किया, तब मुनि बोले-'राजन् ! हम लोग तुम पर प्रसन्न हैं।'
राजा बोले-आप लोग कौन हैं? आपके नाम क्या हैं तथा आप लोग किस लिये यहाँ एकत्रित हुए हैं? यह सब सच-सच बताइये।
मुनि बोले-राजन् ! हम लोग विश्वदेव हैं, यहां स्नान के लिए आये है। माघ निकट आया है। आज से पाँचवें दिन माघ का स्नान आरम्भहो जायेगा। आज ही 'पुत्रदा' नाम की एकादशी है, जो व्रत करने वाले मनुष्यों को पुत्र देती हैं।
पुत्र राजा ने कहा-विश्वदेवगण ! यदि आप लोग प्रसन्न है तो मुझे पुत्र दीजिये।
मुनि बोले-राजन् ! आज के ही दिन 'पुत्रदा' नाम की एकादशी है। इसका व्रत बहुत विख्यात है। तुम आज इस उत्तम व्रत का पालन करो महाराज ! भगवान् केशव के प्रसाद से तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते है-युधिष्ठिर! इस प्रकार उन मुनियों के कहने से राजा ने उत्तम व्रत का पालन किया। महर्षियों के उपदेश के अनुसार विधिपूर्वक पुत्रदा एकादशी का अनुष्ठान किया। फिर द्वादशी को पारण करके मुनियों के चरणों में बारंबार मस्तक झुकाकर राजा अपने घर आये।
तदान्तर रानी ने गर्भ धारण किया। प्रसवकाल आने पर पुण्यकर्मा राजा को तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ, जिसने अपने गुणों से पिता को संतुष्ट कर दिया। वह प्रजाओं का पालक हुआ। इसलिये राजन् ! 'पुत्रदा' का उत्तम व्रत अवश्य करना चाहिये। मैंने लोगों के हित के लिये तुम्हारे सामने इसका वर्णन किया है। जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर 'पुत्रदा' का व्रत करते हैं वे इस लोक में पुत्र पाकर मृत्यु के पश्चात् स्वर्गगामी होते हैं। इस माहात्म्य को पढ़ने और सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
देवदेव जगन्नाथ नारायण नमोऽस्तु ते ।
पुत्रं देहि जगन्नाथ दुःखशोक विनाशनम् ॥
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पुत्रदा एकादशी केवल व्रत नहीं, बल्कि संतान सुख और आध्यात्मिक उन्नति का दिव्य साधन है। श्रद्धा और विधि से किया गया यह व्रत जीवन को सफल बनाता है।
I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.
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