• 31 Mar, 2026

श्रीरामानुजाचार्य का जन्म (१)

श्रीरामानुजाचार्य का जन्म (१)

श्री रामानुजाचार्य जीवन कथा – प्रथम अध्याय 

(पेरुम्बूदूर, जन्मकथा, यज्ञ, आचार्य परम्परा, वैष्णव इतिहास)

मद्रास से लगभग साढ़े तीन योजन (लगभग 14 कोस) नैऋत्य दिशा में पेरुम्बूदूर नामक पवित्र ग्राम स्थित है। संस्कृत में इसे श्री-महाभूतपुरी कहा गया है। यहाँ अधिकांशतः ब्राह्मणों की बस्ती है। गाँव के केंद्र में अत्यंत सुंदर एवं विशाल श्री आदिकेशव पेरुमाल मंदिर स्थित है, जहाँ भगवान विष्णु सस्मित वदन होकर भक्तों पर सदैव कृपा-कटाक्ष करते हैं।

मंदिर के प्रांगण के समीप ही एक देवगृह स्थित है, जहाँ भक्तवत्सल, वेदान्ताचार्य, भाष्यकार, यतिराज – श्री रामानुजाचार्य का दिव्य आसन स्थापित है। देवालय के पीछे निष्कंप एवं निर्मल जल से भरा सरोवर है, जो मानो भक्त-हृदय की पवित्रता का प्रतीक है। चारों ओर की प्राकृतिक छटा—लताएँ-वृक्ष, पक्षियों का मधुर कलरव, पुष्पों की सुगंध—इस स्थान को वैकुण्ठ तुल्य बनाते हैं।

 

आसूरि केशवाचार्य एवं यामुनाचार्य का समय

लगभग हजार वर्ष पूर्व, इसी ग्राम में आसूरि केशवाचार्य नामक एक कर्मनिष्ठ ब्राह्मण रहते थे। उसी काल में यामुनाचार्य (आलवन्दार) श्रीरंग क्षेत्र में संन्यास वेश में विराजमान थे और वैष्णव समाज के सर्वोच्च आचार्य माने जाते थे। उनका वैराग्य, पांडित्य, भक्ति और नम्रता सभी के लिए अनुकरणीय थे। उनके द्वारा रचित स्तोत्र आज भी वैष्णव परम्परा का अमूल्य आधार हैं।

यामुनाचार्य के मुख्य शिष्य पेरियातिरुमलैनम्बि थे। उनकी दो भगिनियाँ –
भूमिपेराट्टि (कान्तिमती)
✔ पेरियापेराट्टि (महादेवी)

कान्तिमती का विवाह पेरुम्बूदूर के आसूरि केशवाचार्य से हुआ और महादेवी का विवाह कमलनयन भट्ट से।

 

संतान-प्राप्ति हेतु यज्ञ और दिव्य स्वप्न

केशवाचार्य अत्यंत यज्ञनिष्ठ थे और "सर्वक्रतु" की उपाधि से विभूषित थे। संतान न होने से व्यथित होकर उन्होंने वृन्दारण्य (वर्तमान – तिरुवल्लिक्केणी / Triplicane) जाकर भगवान पार्थसारथी के समीप कुमुद-सरस् के तट पर यज्ञ आरम्भ किया।

यज्ञ की पूर्णता पर रात्रि में उन्हें भगवान पार्थसारथी का दिव्य दर्शन हुआ। भगवान बोले—
“सर्वक्रतो! मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ। तुम्हें पुत्र की चिंता न रहे। कलियुग में आचार्य-स्वरूप से मैं ही तुम्हारे यहाँ जन्म लूँगा।”

स्वप्न से आनंदित होकर वे पत्नी सहित पेरुम्बूदूर लौट आए।

 

श्री रामानुजाचार्य का दिव्य जन्म

एक वर्ष बाद कान्तिमती ने सर्वलक्षण-सम्पन्न दिव्य पुत्र को जन्म दिया।

📌 जन्म विवरण (शास्त्रीय):

कल्पाब्द4118
शाकाब्द939
संवत्सरपिंगल
तिथिचैत्र शुक्ल पंचमी
नक्षत्रआर्द्रा
वारगुरुवार
लग्नकर्क
गोत्रहारीत
शाखायजुर्वेद


यही बालक आगे चलकर विश्व विख्यात भगवत्पाद श्रीरामानुजाचार्य हुए—धर्म, भक्ति और विशिष्टाद्वैत दर्शन के सूर्य, जिन्होंने अज्ञान-अंधकार का नाश किया।

इसी समय कान्तिमती की बहिन महादेवी के यहाँ भी पुत्र उत्पन्न हुआ—जिसे आगे गोविन्दाचार्य के नाम से जाना गया।

वृद्ध आचार्य श्रीशैलपूर्ण जब नवजात शिशुओं को देखने आए, तो उन्होंने शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर घोषित किया कि यह बालक आदि-शेष (लक्ष्मण) का अवतार है। अतः उन्होंने उसका नाम रखा—"रामानुज" (राम का अनुज)।

 

बाल्यकाल – अद्भुत प्रतिभा एवं साधु-संग

रामानुज चार माह के होते ही सूर्य-दर्शन संस्कार सम्पन्न हुआ तथा समयानुसार—अन्नप्राशन, कर्णवेध, चूड़ाकरण, विद्यारम्भ और उपनयन भी सम्पन्न हुए।

बाल्यावस्था से ही उनकी बुद्धि असाधारण थी। कठिन से कठिन पाठ एक बार सुनते ही पूरा ग्रहण कर लेते थे। धर्म, सदाचार और संत-संग में विशेष रुचि रखते थे।

इन्हीं दिनों वैष्णव संत कांचीपूर्ण स्वामी (पूविरुदवल्ली निवासी) प्रतिदिन श्री परमेश्वर वरदराज के दर्शन हेतु पेरुम्बूदूर से गुजरते थे। एक दिन रामानुज ने श्रद्धापूर्वक उन्हें भोजन हेतु आमंत्रित किया। उनकी भक्ति से प्रभावित होकर काँञ्ची-पूर्ण स्वामी ने उन्हें गहन प्रेम दिया, और यही उनसे प्रथम आध्यात्मिक संबंध था।

 

लक्ष्मणावतार और श्री रामानुज

पूर्वाचार्यों ने स्पष्ट लिखा है कि श्री रामानुजाचार्य, भगवान लक्ष्मण (आदि-शेष) के अवतार हैं।
लक्ष्मण की भाँति—
✔ सत्यनिष्ठा
✔ त्याग
✔ रामभक्ति
✔ धर्म परायणता
✔ जितेन्द्रियता
✔ कर्तव्यनिष्ठा

सभी गुण श्री रामानुजाचार्य में पूर्णरूप से दृष्टिगोचर होते हैं।

जैसे लक्ष्मण ने मारीच-मोह से राम को सावधान किया था, वैसे ही रामानुजाचार्य ने कलियुग के पाखण्ड और दुराचार से जनता को सावधान किया। उन्होंने भगवद्भक्ति (सीतारूपा) को पुनः मनुष्य-हृदय में प्रतिष्ठित किया और भगवद-धर्म की ध्वजा समूचे भारत में फहराई।

 

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Hari Krishna Regmi

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I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.