• 02 Apr, 2026

चतुर्थ अध्याय – बन्धु-समागम | श्रीरामानुज चरित्र कथा

चतुर्थ अध्याय – बन्धु-समागम | श्रीरामानुज चरित्र कथा

“चतुर्थ अध्याय बन्धु-समागम में श्रीरामानुज का घर लौटना, माता-पुत्र मिलन, भगवान की कृपा और श्रीकाञ्चीपूर्ण के साथ दिव्य संगम का भावपूर्ण वर्णन मिलता है।”

चतुर्थ अध्याय – बन्धु-समागम | श्रीरामानुज चरित्र कथा

शालकूप के पवित्र तट पर भगवत्प्रेम में उन्मत्त श्रीरामानुज बार-बार उसकी परिक्रमा करने लगे। व्याध-दम्पति रूप में दर्शन देने वाले श्रीपति-लक्ष्मी पुनः प्रकट होंगे, इस आशा से वे चारों ओर दृष्टि दौड़ाते रहे।

दिन के लगभग दो घड़ी बीत चुके थे। नगर के समीप उस विशाल शालकूप की ओर दो-एक स्त्रियाँ जल लेने आ रही थीं। काञ्चीपुरी यहाँ से लगभग आधा कोस दूर थी। पूर्व, उत्तर और पश्चिम ओर वृक्ष-लताओं का घना फैलाव था, इसलिए वहाँ मनुष्यों का आना-जाना बहुत कम था। इस एकांत वातावरण में श्रीरामानुज हृदय-द्वार खोलकर भगवान की महिमा का कीर्तन कर परम आनन्द में डूबे हुए थे।

उन्होंने भाव-विभोर होकर भगवान की स्तुति की—

कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च ।
नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नमः ।।
नमः पंकजनाभाय नमः पंकजमालिने ।
नमः पंकजनेत्राय नमस्ते पंकजार्णघे ।।”

और फिर श्रीमद्भागवत के दिव्य भाव में डूबकर कहा—

विपदः सन्तु नः शश्वत् तत्र-तत्र जगद्गुरो ।
भवतो दर्शनं यत्स्यात् पुनर्भव-दर्शनम् ।।”

हे जगद्गुरु! आपकी प्रसन्नता से यदि विपद आती है, तो वह भी मंगलमय है, क्योंकि विपत्ति ही आपके साक्षात् दर्शन का अवसर बनती है। आपके दर्शन से जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है।

नमोऽकिञ्चन-वित्ताय निवृत्त-गुणवृत्तये ।
आत्मारामाय शान्ताय कैवल्यपतये नमः ।।”

हे प्रभु! जो भक्त निरवसर, अकिंचन हैं, वही आपके सच्चे पात्र हैं। आप आत्माराम, शांत स्वरूप, सम्पूर्ण जीवों के मुक्तिदाता हैं — मैं आपकी वन्दना करता हूँ।

इसी भक्ति-रस में डूबे श्रीरामानुज को तभी घड़ा लिये तीन स्त्रियाँ आती दीखी। उन्हें देखकर वे काञ्चीपुरी की ओर चल पड़े।

घर-प्रवेश और माता-समागम

उधर घर में माता कान्तिमती पुत्र-विरह में रो रही थीं। अचानक सामने अपने प्रिय पुत्र को खड़ा देखकर वे कुछ क्षण विस्मित रह गईं। जब श्रीरामानुज ने चरणों में गिरकर प्रणाम किया और बोले—
“माता! मैं आ गया हूँ… आप तो प्रसन्न हैं न?”
—तो माता के सभी संदेह दूर हो गए।

उन्होंने पुत्र को गले लगाया, मुख चूमा और आशीर्वाद देते हुए पूछा—
“बेटा, तुम इतने जल्दी आ गए? गोविन्द कहाँ है? लोग तो गंगास्नान के बाद छः महीने में लौटते हैं…”

तब श्रीरामानुज ने क्रम से संपूर्ण घटना सुनाई। यादवप्रकाश की दुरभिसंधि सुनकर माता काँप उठीं। ईश्वर की कृपा का स्मरण कर वे पुत्र-दर्शन से आनंदमग्न हो गईं और भोग बनाने हेतु रसोई में गईं।

किन्तु वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा—लकड़ी घर में थी ही नहीं!
दो-तीन दिनों से रसोई नहीं बनी थी। बहू अपने पीहर गई थी और श्रीरामानुज दूर यात्रा पर थे। माता स्वयं लकड़ी लाने का निश्चय करने ही वाली थीं कि तभी उनकी छोटी बहन दीप्तिमती बहू को साथ लेकर दूसरे द्वार से भीतर आईं।

दीप्तिमती ने कहा—
“बहन, सुना कि तुम रो रही हो, इसलिए देखने आई हूँ। चिंता मत करो, भगवान बच्चों की रक्षा करेंगे।”

इतने में पीछे से श्रीरामानुज ने आकर मौसी को प्रणाम किया। अचानक भांजे को देखकर दीप्तिमती भी आनन्द से विह्वल हो उठीं और गोविन्द का समाचार पूछने लगीं।

बहू भी अत्यंत लज्जाशील, विनीत भाव से पति के चरणों में गिरकर प्रेमाश्रुओं से उनका अभिषेक करने लगी।
घर का प्रत्येक सदस्य मानो आनंद की तरंगों में डूब गया।

प्रसाद-व्यवस्था एवं श्रीकाञ्चीपूर्ण का आगमन

इतने में दासी घी, चावल, शक्कर, शाक, नमक, लकड़ी आदि सभी सामग्री लेकर आ गई। दोनों बहनों ने अत्यंत प्रसन्नता से भगवान का भोग तैयार किया।

भोग लगने के बाद श्रीरामानुज घर के बाहर आए तो देखा—
श्रीकाञ्चीपूर्ण उनके आगमन का समाचार सुनकर वहीं प्रतीक्षा कर रहे हैं।

उन्हें देखते ही श्रीकाञ्चीपूर्ण का हृदय उमंग से भर उठा। उन्होंने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और विनीत भाव से कहा कि “हम चतुर्थ वर्ण हैं, आप मेरे कारण लोकविरुद्ध आचरण न करें।”

श्रीरामानुज ने कहा—
“महात्मन्! आज हमारा सौभाग्य है कि आपका दर्शन हुआ। कृपा करके आज यहीं प्रसाद स्वीकार करें — सब व्यवस्था तैयार है।”

श्रीकाञ्चीपूर्ण ने विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया।

आनन्दोत्सव

घर में उस दिन जो आनन्दोत्सव हुआ, पिता के देहावसान के बाद ऐसा उल्लास कभी नहीं हुआ था।

गोविन्द के न होने से दीप्तिमती को दुःख होना चाहिए था, परन्तु श्रीरामानुज के प्रति उनके पुत्रवत् प्रेम ने उन्हें पूर्णतया आनंदमय कर दिया। वे सबसे अधिक उल्लसित थीं — मानो घर में आज स्वयं नारायण का आगमन हुआ हो।

शालकूप पर भगवत्-स्मरण

श्रीरामानुज का काञ्चीपुरी लौटना

माता कान्तिमती का पुत्र-समागम

मौसी दीप्तिमती और बहू का स्वागत

भगवान के भोग की तैयारी

श्रीकाञ्चीपूर्ण का आगमन

घर में आनन्दोत्सव

 

व्याध-दम्पति की कृपा का स्मरण

श्रीरामानुज की स्तुति प्रार्थनाएँ

घर में अधीर प्रतीक्षा

भक्ति और परिवार का मिलन

Hari Krishna Regmi

Hari Krishna Regmi

I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.