तेरहवाँ अध्याय गरुडपुराण (सारोद्धार) – सपिण्डन विधि, सूतक निर्णय एवं शय्यादान
अशौचकालका निर्णय, अशौचमें निषिद्ध कर्म, सपिण्डीकरणश्राद्ध, पिण्डमेलनकी प्रक्रिया, शय्यादान, पददान तथा गयाश्राद्धकी महिमा
कर्मविपाकवश मनुष्यको अनेक योनियों और विविध रोगोंकी प्राप्ति
गरुडजीने कहा — हे केशव! जिस-जिस पापसे जो-जो चिह्न प्राप्त होते हैं और जिन-जिन योनियोंमें जीव जाते हैं, वह मुझे बताइये ॥१॥
श्रीभगवान् बोले — नरकसे आये हुए पापी जिन पापोंके द्वारा जिस योनिमें जाते हैं और जिस पापसे जो चिह्न होता है, वह मुझसे सुनो॥२॥
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ब्रह्महत्यारा क्षयरोगी होता है, गायकी हत्या करनेवाला मूर्ख और कुबड़ा होता है। कन्याकी हत्या करनेवाला कोढ़ी होता है और ये तीनों पापी चाण्डालयोनि प्राप्त करते हैं ॥३॥
स्त्रीकी हत्या करनेवाला तथा गर्भपात करानेवाला पुलिन्द (भिल्ल) होकर रोगी होता है। परस्त्रीगमन करनेवाला नपुंसक और गुरुपत्नीके साथ व्यभिचार करनेवाला चर्मरोगी होता है॥४॥
मांसका भोजन करनेवालेका अंग अत्यन्त लाल होता है, मद्य पीनेवालेके दाँत काले होते हैं, लालचसे अभक्ष्यभक्षण करनेवाले ब्राह्मणको महोदररोग होता है॥५॥
जो दूसरेको दिये बिना मिष्टान्न खाता है, उसे गलेमें गण्डमालारोग होता है। श्राद्धमें अपवित्र अन्न देनेवाला श्वेतकुष्ठी होता है॥६॥
गर्वसे गुरुका अपमान करनेवाला मनुष्य मिरगीका रोगी होता है। वेदशास्त्रकी निन्दा करनेवाला पाण्डुरोगी होता है॥७॥
झूठी गवाही देनेवाला गूंगा, पंक्तिभेद करनेवाला काना, विवाहमें विघ्न करनेवाला ओष्ठरहित और पुस्तक चुरानेवाला जन्मान्ध होता है॥८॥
गाय और ब्राह्मणको पैरसे मारनेवाला लूला-लँगड़ा होता है, झूठ बोलनेवाला हकलाकर बोलता है तथा झूठ सुननेवाला बहरा होता है॥९॥
विष देनेवाला मूर्ख और उन्मत्त, आग लगानेवाला गंजा, पल बेचनेवाला अभागा और दूसरेका मांस खानेवाला रोगी होता है॥१०॥
रत्न चुरानेवाला हीनजातिमें, सोना चुरानेवाला नखरोगी तथा अन्य धातुओंको चुरानेवाला निर्धन होता है॥११॥
अन्न चुरानेवाला चूहा, धान चुरानेवाला टिड्डी, जलकी चोरी करनेवाला चातक और विषका व्यवहार करनेवाला बिच्छू होता है॥१२॥
शाक-पात चुरानेवाला मयूर, गन्ध चुरानेवाला छुछुन्दरी, मधु चुरानेवाला डाँस, मांस चुरानेवाला गीध और नमक चुरानेवाला चींटी होता है॥१३॥
ताम्बूल, फल, पुष्प चुरानेवाला बंदर तथा जूता, घास, कपास चुरानेवाला भेड़योनिमें जन्म लेता है॥१४॥
रौद्रकर्मोंसे जीविका चलानेवाला, यात्रियोंको लूटनेवाला और आखेटका व्यसनी कसाईके घरका बकरा होता है॥१५॥
विष पीकर मरनेवाला काला नाग और अमर्यादित स्वभाववाला हाथी होता है॥१६॥
बलिवैश्वदेव न करनेवाले तथा बिना परीक्षण भोजन करनेवाले व्याघ्र होते हैं॥१७॥
गायत्री-स्मरण और संध्योपासन न करनेवाला ब्राह्मण बगुला होता है॥१८॥
अयोग्यके यहाँ यज्ञ करानेवाला सूअर, अधिक यज्ञ करानेवाला गधा तथा बिना निमन्त्रण भोजन करनेवाला कौआ होता है॥१९॥
विद्या न देनेवाला ब्राह्मण बैल और गुरुसेवा न करनेवाला शिष्य बैल तथा गधा होता है॥२०॥
गुरुका अनादर करनेवाला और ब्राह्मणको वादमें हरानेवाला ब्रह्मराक्षस होता है॥२१॥
दानकी प्रतिज्ञा तोड़नेवाला सियार और सत्पुरुषोंका अनादर करनेवाला अग्निमुख सियार होता है॥२२॥
मित्रद्रोही गीध, खरीद-फरोख्तमें धोखा देनेवाला उल्लू और वर्णाश्रमनिन्दक कपोत होता है॥२३॥
आशा तोड़नेवाला तथा स्त्रीका परित्याग करनेवाला चक्रवाक होता है॥२४॥
माता-पिता, गुरुसे द्वेष तथा भाई-बहनसे शत्रुता करनेवाला हजारों जन्मोंतक नष्ट होता रहता है॥२५॥
सास-श्वशुरको अपशब्द कहनेवाली तथा कलहप्रिया स्त्री जलौका होती है॥२६॥
पति-परित्यागिनी तथा परपुरुष-सेवन करनेवाली स्त्री चमगादड़, छिपकली या दो-मुँहवाली सर्पिणी होती है॥२७॥
सगोत्रस्त्रीसंग करनेवाला लकड़बग्घा तथा रीछ होता है॥२८॥
तापसीका सहवास करनेवाला पिशाच और अप्राप्तयौवनसे सम्बन्ध करनेवाला अजगर होता है॥२९॥
गुरुपत्नीका इच्छुक गिरगिट, राजपत्नीका गामी ऊँट और मित्रपत्नीका गामी गधा होता है॥३०॥
गुदा-गमन करनेवाला सूअर तथा शूद्रानुरागी बैल होता है। महाकामी व्यक्ति कामलम्पट घोड़ा होता है॥३१॥
मरणाशौचमें भोजन करनेवाला कुत्ता तथा देवद्रव्य-भक्षक मुर्गा होता है॥३२॥
जो ब्राह्मणाधम द्रव्यार्जनके लिये देवताकी पूजा करता है, वह देवलक कहलाता है। वह देवकार्य तथा पितृकार्यके लिये निन्दनीय है॥३३॥
महापातकसे प्राप्त अत्यन्त घोर एवं दारुण नरकोंका भोग प्राप्त करके महापातकी (व्यक्ति) कर्मके क्षय होनेपर पुनः इस (मर्त्य) लोकमें जन्म लेते हैं ॥ ३४॥
ब्रह्महत्यारा गधा, ऊँट और महिषीकी योनि प्राप्त करता है तथा सुरापान करनेवाले भेड़िया, कुत्ता एवं सियारकी योनिमें जाते हैं ॥ ३५ ॥
स्वर्ण चुरानेवाला कृमि, कीट तथा पतंगकी योनि प्राप्त करता है। गुरुपत्नीके साथ गमन करनेवाला क्रमशः तृण, गुल्म तथा लता होता है॥ ३६॥
परस्त्रीका हरण करनेवाला, धरोहरका हरण करनेवाला तथा ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाला ब्रह्मराक्षस होता है॥ ३७॥
ब्राह्मणका धन कपट-स्नेहसे खानेवाला सात पीढ़ियोंतक अपने कुलका विनाश करता है और बलात्कार तथा चोरीके द्वारा खानेपर जबतक चन्द्रमा और तारकोंकी स्थिति होती है तबतक वह अपने कुलको जलाता है॥ ३८॥
लोहे और पत्थरके चूर्ण तथा विषको व्यक्ति पचा सकता है, पर तीनों लोकोंमें ऐसा कौन व्यक्ति है, जो ब्रह्मस्व (ब्राह्मणके धन)-को पचा सकता है? ॥ ३९॥
ब्राह्मणके धनसे पोषित की गयी सेना तथा वाहन युद्धकालमें बालूसे बने सेतु-बाँधके समान नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं ॥ ४० ॥
देवद्रव्यका उपभोग करनेसे अथवा ब्रह्मस्वका हरण करनेसे या ब्राह्मणका अतिक्रमण करनेसे कुल पतित हो जाते हैं ॥४१॥
अपने आश्रित वेद-शास्त्रपरायण ब्राह्मणको छोड़कर अन्य ब्राह्मणको दान देना (ब्राह्मणका) अतिक्रमण करना कहलाता है॥ ४२ ॥
वेदवेदांगके ज्ञानसे रहित ब्राह्मणको छोड़ना अतिक्रमण नहीं कहलाता है; क्योंकि जलती हुई आगको छोड़कर भस्ममें आहुति नहीं दी जाती ॥ ४३॥
हे तात्! ब्राह्मणका अतिक्रमण करनेवाला व्यक्ति नरकोंको भोगकर क्रमशः जन्मान्ध एवं दरिद्र होता है, वह कभी दाता नहीं बन सकता अपितु याचक ही रहता है॥४४॥
अपने द्वारा दी हुई अथवा दूसरे द्वारा दी गयी पृथ्वीको जो छीन लेता है, वह साठ हजार वर्षांतक विष्ठाका कीड़ा होता है॥ ४५ ॥
जो स्वयं (कुछ) देकर पुनः स्वयं ले भी लेता है, वह पापी एक कल्पतक नरकमें रहता है॥ ४६ ॥
जीविका अथवा भूमिका दान देकर यत्नपूर्वक उसकी रक्षा करनी चाहिये; जो रक्षा नहीं करता प्रत्युत उसे हर लेता है, वह पंगु (लँगड़ा) कुत्ता होता है॥४७॥
ब्राह्मणको आजीविका देनेवाला व्यक्ति एक लाख गोदानका फल प्राप्त करता है और ब्राह्मणकी वृत्तिका हरण करनेवाला बन्दर, कुत्ता तथा लंगूर होता है॥४८॥
हे खगेश्वर! प्राणियोंको अपने कर्मके अनुसार लोकमें पूर्वोक्त योनियाँ तथा शरीरपर चिह्न देखनेको मिलते हैं ॥४९॥
इस प्रकार दुष्कर्म (पाप) करनेवाले जीव नारकीय यातनाओंको भोगकर अवशिष्ट पापोंको भोगनेके लिये इन पूर्वोक्त योनियोंमें जाते हैं ॥५०॥
इसके बाद हजारों जन्मोंतक तिर्यक् (पशु-पक्षी)-का शरीर प्राप्त करके वे बोझा ढोने आदि कार्योंसे दुःख प्राप्त करते हैं ॥५१॥
फिर पक्षी बनकर वर्षा, शीत तथा आतप (घाम)-से दु:खी होते हैं। इसके बाद अन्तमें जब पुण्य और पाप बराबर हो जाते हैं तब मनुष्यकी योनि मिलती है॥५२॥
स्त्री-पुरुषके सम्बन्धसे (वह) गर्भमें उत्पन्न होकर क्रमशः गर्भसे लेकर मृत्युतकके दुःख प्राप्त करके पुनः मर जाता है॥५३॥
इस प्रकार सभी प्राणियोंका जन्म और विनाश होता है। यह जन्म-मरणका चक्र चारों* प्रकारकी सृष्टिमें चलता रहता है॥५४॥
मेरी मायासे प्राणी रहट (घटीयन्त्र)-की भाँति ऊपर-नीचेकी योनियोंमें भ्रमण करते रहते हैं। कर्मपाशसे बँधे रहकर कभी वे नरकमें और कभी भूमिपर जन्म लेते हैं ॥ ५५ ॥
अध्याय पूरा हुआ
I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.
अशौचकालका निर्णय, अशौचमें निषिद्ध कर्म, सपिण्डीकरणश्राद्ध, पिण्डमेलनकी प्रक्रिया, शय्यादान, पददान तथा गयाश्राद्धकी महिमा
यमलोक एवं यम-सभाका वर्णन, चित्रगुप्त आदिके भवनोंका परिचय,धर्मराजनगरके चार द्वार, पुण्यात्माओंका धर्मसभामें प्रवेश
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